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जिसकी ख़ातिर जनाज़ा निकला।

                
                                                         
                            एक जनाज़े की ख़ातिर
                                                                 
                            
सारा जहाँ निकल आया,
मगर वो नहीं निकला
जिसकी ख़ातिर जनाज़ा निकला।

ज़िंदगी भर जिसे लगा—
“मेरे अपने बहुत हैं…”
वक़्त ने जाते-जाते
बस इतना समझाया—
कंधे चार ही मिले,
बाक़ी सब अपने-अपने थे।

कल तक जिनके आगे
सिर झुकते थे,
आज उन्हीं की मिट्टी पर
लोग दो पल ठहरकर
आगे बढ़ गए।

इसलिए ऐ इंसान,
इस ज़मीन पर
इतना भी गुरूर मत करना—
जिसे आज अपना तख़्त समझकर बैठे हो,
कल उसी मिट्टी में
तुम्हारा नाम भी
बस एक निशान होगा।

याद रखना—
दुनिया में कितने अपने थे,
ये जनाज़ा नहीं बताता…
तुमने कितनों को अपना माना,
ये तुम्हारा किरदार बताता है।

 
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1 hour ago

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