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सादगी और हया

                
                                                         
                            बैठी है पहली सफ़ में, नज़रें चुरा रही है,
                                                                 
                            
वो अपनी सादगी से, आफ़त वो ढा रही है।

रुख़ पर बिखर रही हैं, ज़ुल्फ़ें हवा के रुख़ से,
अंदाज़-ए-दिलरुबा से, जादू चला रही है।

चोरी से देख कर वो, शर्मा रही है ऐसे,
जैसे कि सुर्ख़ रुख़ पे, लाली सी आ रही है।

होंठों पे ख़ामुशी है, पलकों में है शराफ़त,
बिन बोले ही वो दिल के, जज़्बात गा रही है।

ग़ैरों से बात करना, और हमसे बेरुख़ी यूँ,
शायद हमारी चाहत, वो आज़मा रही है।

 
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8 घंटे पहले

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