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ग़ज़ल: रुख़-ए-जानाँ

                
                                                         
                            रुख़-ए-जानाँ की वो सूरत ख़ुदा की एक रहमत है,
                                                                 
                            
असीरों को जो मिल जाए, तो लगती एक ज़मानत है।

नज़र जब उस पे पड़ती है, ज़माना भूल जाता हूँ,
वो लम्हा इक मोहब्बत का, ख़ुदा की ख़ास नेमत है।

उठाए जब वो पलकों को, सवेरा मुस्कुराता है,
झुकाए जब वो नज़रों को, हसीं शाम-ए-मोहब्बत है।

चमन के फूल भी झुक कर, उसे तस्लीम करते हैं,
वो चलती है तो राहों में, यहाँ आती क़यामत है।

सँवरती है जो वो हँसकर, महक उठती है तन्हाई,
हया का सुर्ख़ रंग उसका, वफ़ा की ही इनायत है।

उसे देखना, उसे चाहना, उसे ही सोचते रहना,
यही दिल की तमन्ना है, यही अपनी रिवायत है।

 
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8 घंटे पहले

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