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पुराना साल और नया सबेरा

ढलती रात, ढलता सूरज
                
                                                         
                            “ढलती रात,
                                                                 
                            
ढलता सूरज और
ढलता साल।
पीछे छोड़ रहा है,
कुछ ज़ख्म,
टूटे सपने,
और अधूरे सवाल।
वही तस्वीर,
वही तकदीर,
वही तराना है।
वही ज़िद,
वही जिंदगी,
वही ज़माना है।
जो गुज़रा,
जो गुज़ारा,
जो गुज़र चुका है।
वो टूटा,
फिर संभला,
अब बिखर चुका है।
वो सीखा,
जो सिखाया,
अब निखर चुका है।
नई आशा,
नए सपने,
नया आसमान बांधा हैं।
नए लक्ष्य,
नए तरकश में,
नया तीर साधा है।”

~दर्शन सिंह
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3 वर्ष पहले

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