गंगा की लहरें, पावन धारा,
हर एक बूंद में सिमटा जग सारा।
पर प्रदूषण की मार है ऐसी,
खो रही अपनी छटा वो प्यारी।
हरिद्वार से कोलकाता की दूरी,
पर प्रदूषण की कथा है अधूरी।
फ़ैक्ट्रियों के विषैले रसायन
,बिगाड़ रहे माँ का स्वास्थ्य और मन।
पर गंगा की आत्मा अब भी अमर है,
पुकारती हमें, उसकी यही गुहार है।
जैसे आधार से है सबकी पहचान,
वैसे ही गंगा रक्षा से हो हमारा उत्थान।
पर गंगा की आत्मा अब भी अमर है
,पुकारती हमें, उसकी यही गुहार है।
जैसे आधार से है सबकी पहचान,
वैसे ही गंगा रक्षा से हो हमारा उत्थान।
गंगोत्री में जो धारा नीली-निर्मल बहती थी,
प्रयागराज आते-आते वो सांवली सी दिखती थी।
पटना से कोलकाता तक झाग का वो मेला था,
सुंदरवन पहुँचकर तो बस आंसुओं का रेला था।
माना सदियों पुरानी है, कोई अधिकार पत्र नहीं,
पर करोड़ों की प्यास बुझाने का कोई विकल्प नहीं।
कहीं श्रद्धा की आरती, कहीं उपेक्षा की धार देखी,
सुंदरवन के मुहाने पर मैंने उसे बिखरते देखी।
-तन्मय मिश्रा
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