मैंने उसे मध्य प्रदेश जैसा चाहा
पर वो उत्तर प्रदेश जैसी निकली,
बड़ी बेवफाई की उसने जानम
अपने इकरार से इस कदर फिसली,
मेरी जीत की ख़ुशी में भी हार का आलम था
पर उसकी हार में भी बेपनाह ख़ुशी निकली ।
कोई अस्तित्व के लिए हाफ रहा था
उसे बरगद की घनी छाँव मिली,
किसी की घनी छाँव से, ऐसी हुई रुखसत
किसी और की छतरी में, जाकर पनाह मिली,
मेरी मोहब्बत अब बैसाखी के सहारे है दोस्तों
न जाने कब, किस हाल में, कौन सी डगर फिसली।
विश्वास की ये डोर, बहुत कच्ची है
निभ पायेगी जब तक हम दोनों की नियत अच्छी है,
यह मोहब्बत भी अब शायद समझौतों पर चलेगी
ये डर है, हम दोनों की अब, कब तक निभेगी ,
अब अकेले सफर करना आसान न होगा
अब तो जिंदगी उनको साथ लेकर चलेगी।
मोहब्बत भी कितने करवट बदलती है
कभी सच तो कभी बनावटी लगती है,
पर अब तो उन्हें देखकर मुस्कराना पड़ेगा
कसक दिल में, गर है, तो छिपाना पड़ेगा,
अरे ओ मोहब्बत तू बेवफा न होना
इस ज़माने से मुझको अब डरना पड़ेगा।
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