ज़िंदगी को देखा है अक्सर
अपनी ओर आते हुए
फिर ठिठक कर किसी और
तरफ़ बड़ी दूर जाते हुए
ये हुआ इक बार न
ना जाने पर कितनी ही दफ़ा
सच है क्या जो कहते हैं सब
कि ज़िंदगी है बेवफ़ा
ये दिखाती है सपने
अनगिनत कई रंग के
और मिलाती लोगों से
कई रंग कई ढंग के
फिर आता है इक वक़्त
जब रहना सपने ना कोई लोग ही
नज़रें चुराती सी नज़र आती है
उस पर ये ज़िंदगी
और हम रह जाते हैं अकेले
अपने हाल पे पछताते हुए
ज़िंदगी को देखा है...।
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