आप अपनी कविता सिर्फ अमर उजाला एप के माध्यम से ही भेज सकते हैं

बेहतर अनुभव के लिए एप का उपयोग करें

विज्ञापन

ज़िंदगी को देखा है

                
                                                         
                            ज़िंदगी को देखा है अक्सर
                                                                 
                            
अपनी ओर आते हुए
फिर ठिठक कर किसी और
तरफ़ बड़ी दूर जाते हुए
ये हुआ इक बार न
ना जाने पर कितनी ही दफ़ा
सच है क्या जो कहते हैं सब
कि ज़िंदगी है बेवफ़ा
ये दिखाती है सपने
अनगिनत कई रंग के
और मिलाती लोगों से
कई रंग कई ढंग के
फिर आता है इक वक़्त
जब रहना सपने ना कोई लोग ही
नज़रें चुराती सी नज़र आती है
उस पर ये ज़िंदगी
और हम रह जाते हैं अकेले
अपने हाल पे पछताते हुए
ज़िंदगी को देखा है...।
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
4 घंटे पहले

कमेंट

कमेंट X

😊अति सुंदर 😎बहुत खूब 👌अति उत्तम भाव 👍बहुत बढ़िया.. 🤩लाजवाब 🤩बेहतरीन 🙌क्या खूब कहा 😔बहुत मार्मिक 😀वाह! वाह! क्या बात है! 🤗शानदार 👌गजब 🙏छा गये आप 👏तालियां ✌शाबाश 😍जबरदस्त
विज्ञापन
X
बेहतर अनुभव के लिए
4.3
ब्राउज़र में ही

अब मिलेगी लेटेस्ट, ट्रेंडिंग और ब्रेकिंग न्यूज
आपके व्हाट्सएप पर