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दिखावे का युग

                
                                                         
                            "सच की राहें सूनी हो चलीं,
                                                                 
                            
और रोशनी मंचों पर बिक गई—
रिवाज़ जो थे आत्मा के लिए,
सेल्फी की दीवारों पर चिपक गई।

पूजा भी अब कैमरामैन ढूँढती,
व्रत भी लाइक्स गिनता है;
भीतर की शांति चुपचाप रोती,
बाहर का शोर ही गुनता है।

समुचित जो था—संयम, मर्यादा,
उत्सव का अर्थ, गंभीरता—
सबने पहन लीं चमकीली नक़ाबें,
और बन गई बस औपचारिकता।

हर क्षण पर पोस्ट का पहरा,
हर भाव पर फिल्टर चढ़ा;
हृदय की भाषा पिछड़ गई,
स्टेटस-अपडेट आगे बढ़ा।

जहाँ नम्रता हाथ जोड़ती थी,
अब स्पॉटलाइट माँगती है;
प्रेम का काम था बाँधना,
वह भी प्रायोजित होने लगती है।

इस शोरभरे शापित समय में,
खालीपन ताली बजाता है—
और सच्चा मौन, जो औषधि था,
कोने में बैठा रह जाता है।

ओ मन, एक पल ठहर,
अंदर उतर—स्वर सुन ले;
उत्सव तभी उत्सव होगा,
जब दिखावा उतरकर सच बन ले।"
 
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8 महीने पहले

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