तस्वीरें कहती घूर घूरकर
मसली गई वे चूर चूरकर
जिनमें कभी खुशियां बसी
तोड़ा-मरोड़ा गया, दूर कर।
बेकार कोसना , तकदीर को
सम्हालने जिन्हें था तस्वीर को
अनुगृहित रहे वो भी नहीं
रौंद डाला छोटी, जागीर को।
आंसू टपकाती हुई तस्वीर
स्वयं बताती है निज पीर
उसके अरमानों की डोली उठी
तोड़कर बनाई हुई, प्राचीर।।
तस्वीर की, दरारें, सिलवटें
कहती अपनों ने जमकर लूटें
रहे बैठे बहार-ए-चमन में भी
रूक रहीं धड़कने,और दम घूंटे।।
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