आप अपनी कविता सिर्फ अमर उजाला एप के माध्यम से ही भेज सकते हैं

बेहतर अनुभव के लिए एप का उपयोग करें

विज्ञापन

बेवफ़ाई से निर्मित यह अश्रु-मश्क

                
                                                         
                            जब से आँसुओं ने क़ीमत खोई,
                                                                 
                            
दुखी रहे हम, पर आँख न रोई।
मन:स्थिति और आँसू का व्युत्क्रम,
मन हल्का, आँसू भारी-भरकम।

आँसुओं के वज़न में आती कमी,
सूख जाते, खो देते अपनी नमी।
मन जब होता है ग़म से भारी,
मन-आँसू की यह नीति न्यारी।

आज तो हर एक संबंध है झाँसू,
जो रुलाए हमें बहा के ख़ूनी आँसू।
काश कोई मेरे आँसू पी जाता,
मेरा जीवन वही संग जी जाता!

साझा कर लेता जो मेरा ग़म,
हो जातीं उसकी भी आँखें नम।
पर ऐसा दोस्त या संबंधी कोई नहीं,
सब घड़ियाली आँसू रोते यहाँ सही।

आँसू—विरह-वेदना का बहाव,
अभाव और गहरे लगाव का प्रभाव।
करुणा-कलित हृदय का ही अंश,
पर तूने दिए दगाबाज़ी के दंश।

पत्थर-दिल तेरी यह प्रेम-क्रीड़ा,
अनवरत पहुँचाती रही मुझको पीड़ा।
तब बन जाते हैं नयनों के झरने,
दिल टूटे तो लगते हैं ये बहने।

अगर आँसू के पीछे है हरजाईपन,
जो धोखे खाने से हुई है उत्पन्न।
दंडित हुए हम, किए बिना कोई जुर्म,
अनवरत बहते रहेंगे ये ता-उम्र।

बेवफ़ाई से निर्मित यह अश्रु-मश्क,
छलकाती है ज़हरीले, अनंत अश्क।
हर आँसू की यहाँ अलग कहानी है,
कभी इसे दिखानी, कभी छिपानी है।
— विजय बहादुर तिवारी
 
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
41 मिनट पहले

कमेंट

कमेंट X

😊अति सुंदर 😎बहुत खूब 👌अति उत्तम भाव 👍बहुत बढ़िया.. 🤩लाजवाब 🤩बेहतरीन 🙌क्या खूब कहा 😔बहुत मार्मिक 😀वाह! वाह! क्या बात है! 🤗शानदार 👌गजब 🙏छा गये आप 👏तालियां ✌शाबाश 😍जबरदस्त
विज्ञापन
X
बेहतर अनुभव के लिए
4.3
ब्राउज़र में ही

अब मिलेगी लेटेस्ट, ट्रेंडिंग और ब्रेकिंग न्यूज
आपके व्हाट्सएप पर