सुबह निकलता घर से वो,
बोझ कंधे पर उठाए।
अपने हर एक दर्द को वो,
चुपचाप दिल में दबाए।
कोई नहीं जो ये पूछे,
तू थका है या है टूटा।
ज़िंदगी की इस दौड़ में,
हर एक सपना है छूटा।
धूप में वो खुद को जलाए,
तब घर का चूल्हा जलता है।
हर एक पल वो अपनों की खातिर,
काँटों पर चलता है।
मगर बदले में जब उसको,
कोई इज़्ज़त नहीं मिलती,
तो अकेले में उसकी रूह,
अंदर तक है हिलती।
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