अंधकार दिए से नहीं
उजाले के प्रकाश से मिटेगा
और उजाला उजाले से झलकेगा ऐ मास्टर
आज अंधेरा छाया हुआ है
रात का अंधेरा नहीं
जातिवाद का अंधेरा
सम्प्रदायवाद का कोहरा
भ्रष्टाचार की धुंध
अंहकार तमिस्र
ओछी नीयत की ओस
दानवी रात दबाए बैठी है इंसानियत
ऐ मास्टर अब तू बन रवि
तू दिनकर बन
तू कवि नहीं कविता बन
और फैला उजियारा
जिससे मिट जाए
सारे जहां से तिमिर
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