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ना घर बसाना समंदर किनारे

                
                                                         
                            ना नाच तु किसी और के ईशारे में ।
                                                                 
                            
ना घर बसा लेना संमदर किनारे में॥

कोई किसी का नही होता
छोड़ चला जायेगा तुझे रोता ।
ना अपनी मंजिल खोना
ना किसी का तू होना॥

बडे मिठे बोल में ना फंसना
ना यूं ही किसी को हाँ कहना ।
एक बार अपने जमीर से पूछना
ये संमद है कि दरिया है क्या इसमें बहना॥

- भुनेश्वर अनंत 
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
41 minutes ago

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