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आशाओ की दीप

                
                                                         
                            मंछदार में डूबी नईया पार लगादो
                                                                 
                            
खामोश है राते
ऐ चिराग ! तू दीप जला दो।
बुझी बुझी सी समाये है
ऐ चिराग !तू आज आशियाने में भी समा बांध दो।।

हसरते भी बढ़ी है
निगाहे ताकती है।
पतझड़ के बाद
बंसत मे फिर बहार आती है ।।

चमकते चमन की खुशबु में
आशाओ की रंग है
ना करू शिकवा मै
जीना ही तो बड़ी जंग है।।

नन्ही कली कहती
आज मेरे तन मन में हरियाली भर दो।
सुनले ऐ चिराग ! इस बेजान जान में
आशाओ के दीप जला दो।।
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55 मिनट पहले

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