ऐ जिंदगी! यूँ ही कभी कभार आ मिल मुझसे
तोड़ कर सारे बंधन, सारी ज़ंजीरें आ मिल मुझसे ।
कभी फुर्सत से करेंगे हिसाब-क्या खोया, क्या पाया-हमने
आज भूलाकर दिल के सारे गिले-शिकवे आ मिल मुझसे ।
मुस्तकबिल में हम तुम कभी मिले न मिले ..किसे ख़बर?
आज उम्र के इस तन्हा मोड़ पर आ मिल मुझसे।
जरुरी तो नहीं तेरे मेरे दरमियान एक रिश्ता लाज़मी हो
बग़ैर रिश्ते के भी कभी अपनेपन से आ मिल मुझसे।
बादल जब झुक कर पहाड़ों के कदम बोसी करने लगे
गुलाबी मुलायम शाम की रानाई में आ मिल मुझसे ।
दिलों की तरह माना तेरी गलियाँ भी तंग और सख़्त हैं
चार क़दम मेरे चार क़दम तेरे.. किसी दो राहें पर आ मिल मुझसे।
मुतमइन हूँ तू गर मेरी नहीं तो किसी और की भी नहीं
अनजान सी किसी डगर पे अजनबी सी आ मिल मुझसे।
माना कोई वादा नहीं फिर भी न जानें क्यूँ इंतज़ार रहता है
उम्मीदों की कश्ती पे सवार यादों के साहिल पर आ मिल मुझसे।
नदी के दो किनारों से हम तुम रहे ता उम्र आमने सामने
आज समानानंतर रेखाओं सी अनन्तता में आ मिल मुझसे !
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