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धड़कनों को भी तुम्हारी आहट का पता है।

                
                                                         
                            सुनो ऐ मेरी रोज़ की परेशानियों,
                                                                 
                            
कभी तो बैठो अपनेपन से पास हमारे।
हर दिन नया हिसाब लेकर आ जाती हो,
कभी तो समझो हाल-चाल हमारे।
बचपन की देहली से लेकर आज तलक,
साथ तुम्हारा कभी नहीं छूटा।
खुशियों ने तो पल भर में मुख मोड़ लिया,
नाता तुम्हारा कभी नहीं टूटा।
हम तो तुम्हारी दुकान के सबसे पक्के ग्राहक हैं,
हर एक दर्द की पूरी कीमत चुकाई है।
आँखों से गिरे हर एक आँसू के बदले,
हमने अपनी रातों की नींद गँवाई है।
ज़िंदगी की इस राह में जब भी कदम रखा,
तुमने हर मोड़ पर नया बोझ थमा दिया।
पहला घाव अभी भरा भी नहीं था ठीक से,
सिर पर एक और नया दुखड़ा ला दिया।
अब तो चेहरे की लकीरें भी जानने लगी हैं तुम्हें,
धड़कनों को भी तुम्हारी आहट का पता है।
इतनी सच्चाई से साथ निभाया तुम्हारा,
फिर भी ज़रा सी छूट न मिले, ये कैसी सज़ा है?
हम ये नहीं कहते कि सारा बोझ उतार दो,
बस दो पल चैन की साँस लेने की छूट दे दो।
इस थके-हारे मुसाफ़िर के हाल पर,
थोड़ी सी राहत की बूँद रख दो।
कल भी हम तुम्हारे ही सामने खड़े मिलेंगे,
जब तक इस सीने में साँसों की डोर चलेगी।
मगर आज इस पुराने ग्राहक की खातिर,
क्या तुम्हारी ये सख़्ती थोड़ी सी पिघलेगी?
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36 मिनट पहले

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