आँखों से बस दिखते हैं
चेहरे, रस्ते और बाज़ार,
लेकिन दिल ही समझ पाता है
दर्द, दुआ और सच्चा प्यार।
अंधा वो नहीं जिसकी आँखें
उजालों से अनजान रहीं,
अंधा वो है जिसके सीने में
इंसानियत ही बेजान रही।
हाथ टटोल के माँ पहचान ले
अपने बच्चे की हर चाल,
आँखों वाले देख न पाते
बूढ़े बाप का रोता हाल।
सूरज छूटे, दीप बुझे,
तो भी मन में उजास रहे,
देख न पाए दुनिया को पर
नेकी सदा ही पास रहे।
दिल में अगर करुणा जागे तो
हर आह सुनाई देती है,
बिना नज़र के भी रूहों की
सच्चाई दिखाई देती है।
और दिल में जब पत्थर जम जाए,
घुल जाए जब अहंकार,
खुली आँख भी देख न पाए
अपनों की भी चीख-पुकार।
शीशा केवल रूप दिखाता,
रंग-रूप का ठाठ बड़ा,
दिल की आँखें देख ही लेतीं
भीतर कौन सा सच है खड़ा।
आँखें तो बस खिड़की हैं
जो बाहर का सब दिखलाती हैं,
पर दिल की नज़रें ही जीवन का
असली मोल बताती हैं।
सूखे दिल को आँख मिले तो
रोशनी भी किस काम की?
नज़रें होकर भी अंधा है वो,
ज़िंदगी बस नाम की।
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
कमेंट
कमेंट X