आप अपनी कविता सिर्फ अमर उजाला एप के माध्यम से ही भेज सकते हैं

बेहतर अनुभव के लिए एप का उपयोग करें

विज्ञापन

अधिकार

                
                                                         
                            सच में अर्जुन ठीक ही था,
                                                                 
                            
भूल गया रिश्ता नाता।
सच से सभी विमुख हो गए,
तो क्या?वह संबंध निभाता।।

आये जब अधिकार की बात,
कोई नहीं देता है साथ।
खुद आगे बढ़ना पड़ता है।
संकट से लड़ना पड़ता है।।

उठो पार्थ! गांडीव उठाओ,
शांति शक्ति की दासी है।
शत्रु दमन करने पर ही,
सदियों की शांति आती है।।
-विशाल 
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
एक वर्ष पहले

कमेंट

कमेंट X

😊अति सुंदर 😎बहुत खूब 👌अति उत्तम भाव 👍बहुत बढ़िया.. 🤩लाजवाब 🤩बेहतरीन 🙌क्या खूब कहा 😔बहुत मार्मिक 😀वाह! वाह! क्या बात है! 🤗शानदार 👌गजब 🙏छा गये आप 👏तालियां ✌शाबाश 😍जबरदस्त
विज्ञापन
X
बेहतर अनुभव के लिए
4.3
ब्राउज़र में ही

अब मिलेगी लेटेस्ट, ट्रेंडिंग और ब्रेकिंग न्यूज
आपके व्हाट्सएप पर