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तिरी गली के सिवा दिल...

                
                                                         
                            तिरी गली के सिवा दिल कहीं नहीं आता।
                                                                 
                            
ये और बात कि तू आफ़रीं नहीं आता।

नज़र में कोई भी चेहरा हसीं नहीं आता,
तिरे सिवा कोई ऐ दिल-नशीं नहीं आता।

मकाँ तो मिल गए हर मोड़ पर नए लेकिन,
जो घर को घर सा बना दे मकीं नहीं आता।

मैं ख़्वाब में तो उसे रोज़ पा ही लेता हूँ,
सहर में आँख खुले तो कहीं नहीं आता।

नज़र उठाऊँ तो तारों की भीड़ मिलती है,
नज़र में चाँद सा चेहरा कहीं नहीं आता।

बहुत से लोग मिले रास्ते में मुझको मगर,
कोई भी तेरी तरह हम-नशीं नहीं आता।
- अज़हर साबरी
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3 घंटे पहले

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