हवा तो रोज़ ही घर से गुज़र के जाती है।
तिरी गली से मगर वो ठहर के जाती है।
तिरे ख़याल की इक रोशनी को छूते ही,
तमाम रात मिरी फिर सँवर के जाती है।
न जाने कौन-सी ख़ुशबू बसी है मिट्टी में,
सबा भी तेरी गली में बिखर के जाती है।
जहाँ से बहती है तेरी निगाह की वो नदी,
नज़र हमारी वहीं पर उतर के जाती है।
मलाल-ए-हिज्र में डूबी हुई ये शाम भी,
तिरे हुज़ूर से कुछ पल सँवर के जाती है।
चराग़-ए-शब की तिरी लौ से जो दुआ निकली,
फ़लक की हद से भी आगे गुज़र के जाती है।
तिरे मकाँ की ख़ामुशी का ख़ौफ़ ऐसा है,
कि हर सदा तिरे आँगन से डर के जाती है।
- अज़हर साबरी
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