हर ज़ख़्म को फूलों से छुपाने नहीं आते।
हर टूटे हुए ख़्वाब सजाने नहीं आते।
अब याद के मौसम भी सुहाने नहीं आते,
रूठे हुए रिश्ते भी मनाने नहीं आते।
आँखों में समंदर हो, बहाने नहीं आते,
हम को कभी रो कर के दिखाने नहीं आते।
ताबीर की उम्मीद में कब तक कोई जागे,
अब ख़्वाब भी आँखों को लुभाने नहीं आते।
सच्चाई पे अड़ जाना तो आदाब हैं अपने,
हम को तो अदालत में बहाने नहीं आते।
ख़ुद्दार क़बीले के हमीं लोग बचे हैं,
दहलीज़ पे सर अपना झुकाने नहीं आते।
जो दिल में उतर जाए, ज़ुबाँ पर नहीं लाते,
हम दिल का कोई राज़ बताने नहीं आते।
सच बोल के हम ख़ुद को गँवाते भी रहे हैं,
अब झूठ को रिश्तों में मिलाने नहीं आते।
- अज़हर साबरी
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