तुम्हारी बरसात तुम्हारी आँख मूँद देती है
और फिर तुम निकलते हो, बन्द आँखों से ही
गाड़ी में बैठकर सुकून से, पर्यटक बनकर,
जब तुम्हारी दृष्टि को ठिकाना मिल जाता है
कोई पुराना किला प्रकट होता है आमेर सा
कोई ऐतिहासिक इमारत हवामहल सी
कोई घूमने-फिरने की जगह, बाँध, घाटी, महल
बाँसुरी की आवाज, भुट्टा खाने का आनन्द।
पर मेरी बरसात मेरी आँखें खुलवा देती है
मैं देखता हूँ खुद को फँसा हुआ जाम में,
फुफकारता हुआ जलभराव, तैरती कारें
कचरे का ढेर, बिखरी पन्नियाँ, गड्डों में गिरते लोग
पैदल चलने पर पेंट के पीछे कीचड़ के छींटे
मोटरसाइकिल के टायर से पिचकते हुए कीड़े।
तुम्हारी बरसात तुम्हारे जीवन का स्वप्न-सिद्ध है..
मेरी बरसात मेरे संसार का यथार्थ-बोध है..
........
- अवतार सिंह अक्षरजीवी
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
कमेंट
कमेंट X