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जनता सीपियों सी है

                
                                                         
                            भ्रष्टाचार के सागर में जनता सीपियों सी है।
                                                                 
                            
पानी है बहुत खारा ये सांसे हिचकियों सी हैं।।
सड़क पर आ गई पीढ़ी बगावत खून में उनके ।
वो कहते हैं तुम्हारी ये बगावत हिप्पियों सी है।।
बड़े महलों के पहिए में दबी है लाश रग्घू की ।
ये पसरी बेबसी फुलिया के घर की सिसकियों सी है।।
अदालत की चौखट पर खड़ी है आन गुरबत की ।
बुझा चिराग घर की कोख उजड़ी बस्तियों सी है।।
जो पन्ना खोलता हूं मैं वहां बस बेबसीयत है।
मेरी किस्मत की उलझन सिंधु की उन लिपियों सी है।।
~अतुल नारायण वर्मा
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4 घंटे पहले

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