मां माटी मुझे पुकार रही
इन तेज पवन के झोकों से वो
भिजवा मुझको तार रही
मां माटी मुझे पुकार रही
बचपन जिसकी गोद में बीता
होगी तरुणाई की हार वही
मां माटी मुझे पुकार रही
माटी तो माता होती है
तुमने ये सिखलाया मां
माटी से बढ़कर कोई न दूजा
तुमने ये बतलाया मां
भारत है देवों की भूमि
है धर्म का मेरे सार यही
मां माटी मुझे पुकार रही
पक्षी करके कलरव मां मुझे
संदेशा दे जाते हैं
भारत मां के आवाह्न को
गाकर मुझे सुनाते हैं
माता देखो बुलाती मुझको
पुरवाई वो बयार रही
मां माटी मुझे पुकार रही
माटी के अहसान को मैं तो
पूर्ण नहीं कर सकता मां
माटी को है आन पड़ी तो
धीर नहीं धर सकता मां
उस माटी की चिट्ठी लाई
सावन की ये फुहार नई
मां माटी मुझे पुकार रही
मां माटी मुझे पुकार रही
- अश्वनी
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
कमेंट
कमेंट X