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मजलूमों कों कभी तुम सताना नहीं

                
                                                         
                            बरसों तक रूम में जाग-जाग,
                                                                 
                            
भरी हमने खुद में इतनी आग।
सुख-दुख को सहता रहा अनवरत,
न जाने किये हमने कितने त्याग।
पर हाय तेरी बहरी सरकार,
किया पेपर लीक लीक बार-बार।
है तेरी महिमा अपरम्पार,
चाहे हो जिसकी सरकार।
पेपर लीक होता हर बार,
पढ़ने वालों को मिला ठेँगा।
नौकरी रही न गरीब द्वार,
आखिर छात्र करें कब तक त्याग।
हे 'महामानव' तू बतला दे अब,
तेरे दर पर आए 'हम'।
अपना हलफनामा ले आये हम,
कितने अनशन - कितने आन्दोलन।
सब व्यर्थ रहा सुन जनार्दन,
न लगाये नारे बार-बार।
इंकलाब जिंदाबाद - २
पर हमें मिला बस लाठी और जेल,
अबला, बालक और वृद्ध सब बेकार।
ज्ञानी, ध्यानी और योगी भी सब,
सब कर रहे हैं चीख-पुकार।
तूने भी न सुनी तो कौन सुने,
छात्रों की यह करुण पुकार।
— अमित
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4 घंटे पहले

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