आप अपनी कविता सिर्फ अमर उजाला एप के माध्यम से ही भेज सकते हैं

बेहतर अनुभव के लिए एप का उपयोग करें

विज्ञापन

हे मां तुम न अश्रु बहाना

                
                                                         
                            हे माँ तुम ना अश्रु बहाना ,
                                                                 
                            
खूब सजाना पाती दीपों की,
अपने रोते मन को समझाना,
दीप जलें तो लौ में नित क्षण,
मेरे हँसते सपनों को ही पाना,
पर हे माँ तुम ना अश्रु बहाना।

बिखरी है हर पग पर हर पथ ,
राख उड़ी तो अंतिम मेरी,
विजय पताका फहराएगी,
मेरी अंतिम श्वास की भेरी,

दर्द छिटक कर जो आ जाए,
उसको पल में दूर हटाना,
आंखे कितना भी कोसें तुमको,
पर हे माँ तुम ना अश्रु बहाना।

- आशीष त्रिवेदी,
कानपुर/गुरुग्राम


हमें विश्वास है कि हमारे पाठक स्वरचित रचनाएं ही इस कॉलम के तहत प्रकाशित होने के लिए भेजते हैं। हमारे इस सम्मानित पाठक का भी दावा है कि यह रचना स्वरचित है। 

आपकी रचनात्मकता को अमर उजाला काव्य देगा नया मुक़ाम, रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें
6 वर्ष पहले

कमेंट

कमेंट X

😊अति सुंदर 😎बहुत खूब 👌अति उत्तम भाव 👍बहुत बढ़िया.. 🤩लाजवाब 🤩बेहतरीन 🙌क्या खूब कहा 😔बहुत मार्मिक 😀वाह! वाह! क्या बात है! 🤗शानदार 👌गजब 🙏छा गये आप 👏तालियां ✌शाबाश 😍जबरदस्त
विज्ञापन
X
बेहतर अनुभव के लिए
4.3
ब्राउज़र में ही

अब मिलेगी लेटेस्ट, ट्रेंडिंग और ब्रेकिंग न्यूज
आपके व्हाट्सएप पर