न सही की कोई ज़िद हो, न ग़लत की बात हो,
आओ उस जगह मिलें जहाँ बस दिल की बात हो।
तुम मुझे मेरी ख़ताओं से न तौलो आज फिर,
मैं तुम्हें तुम्हारी कमियों से न देखूँ, ऐसी रात हो।
छोड़ दें हम फ़ैसले दुनिया के सारे एक पल,
तुम मेरे पास आओ और न कोई सवालात हो।
न तुम्हारा कोई मज़हब, न मेरा कोई गुमाँ,
बस मोहब्बत दरमियाँ हो और रूहों की मुलाक़ात हो।
जो कहा, जो अनकहा—सब आज रहने दो यहीं,
कुछ न कहना भी कभी सबसे हसीं संवाद हो।
दूरियाँ, शिकवे, गिले सब छोड़कर आओ ज़रा,
एक ऐसा मैदान हो जहाँ न जीत हो, न मात हो।
‘अशफ़ाक़’ जहाँ दुनिया हमें बाँटती रही उम्रभर,
चलो उस जगह मिलें जहाँ सिर्फ़ मोहब्बत की ज़ात हो।
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