मुझ पर ऐसे-ऐसे इल्ज़ाम लगाए हैं,
कि अपने भी मुझे देखकर मुस्कुराए हैं।
जो बात मेरी थी, वो किसी और की कर दी,
मेरे ही लफ़्ज़ों से मेरे ख़िलाफ़ फ़ैसले सुनाए हैं।
जो मन में आया, उन्होंने कह दिया मुझको,
जो समझ नहीं आया, वो भी मेरे नाम लगाए हैं।
मैं ख़ामोश रहा तो उसे मेरी ख़ता कह दिया,
मेरी चुप्पी को भी जाने कितने इल्ज़ाम सुनाए हैं।
इनका बस चले तो हर ज़ख़्म मेरे नाम कर दें,
जो ख़ून भी बहा है, वो मेरे सर लगाए हैं।
मैंने रिश्तों की हिफ़ाज़त में बहुत कुछ सह लिया,
उन्होंने हर सब्र को मेरी कमज़ोरी के नाम लगाए हैं।
अब किस-किस बात की सफ़ाई दूँ मैं उन्हें,
जिन्होंने सवाल भी ख़ुद किए, जवाब भी ख़ुद बनाए हैं।
‘अशफ़ाक़’ अब शिकायत भी किससे करें हम,
जिन्होंने कहानी लिखी, किरदार भी हमें बनाए हैं।
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