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मैं मोहब्बत की किताब में अपनी कहानी नहीं चाहता

                
                                                         
                            मैं मोहब्बत की किताब में अपनी कहानी नहीं चाहता,
                                                                 
                            
तेरे हिस्से में रहूँ, ख़ुद की निशानी नहीं चाहता।

बहुत देखे हैं रिश्ते जो वक़्त के साथ बदल जाते हैं,
मैं ऐसा कोई रिश्ता, जो हो बे-मानी, नहीं चाहता।

न मुझे वादों की भीड़ चाहिए, न क़समों का सिलसिला,
जो दिल में हो वही कह दे—ऐसी ज़ुबानी चाहता।

मुझे मालूम है हर शख़्स बदल जाता है यहाँ,
मैं किसी शख़्स से उम्र-भर की मेहरबानी नहीं चाहता।

मुझे मालूम है मोहब्बत में दर्द भी मिलता है,
मगर हर ख़ुशी के बदले कोई वीरानी नहीं चाहता।

तू अगर मेरी है तो फिर मेरी ख़ामोशी भी समझ,
मैं हर एहसास की तुझसे ज़ुबानी नहीं चाहता।

‘अशफ़ाक़’ इतना ही काफ़ी है कि सुकून से रहूँ,
मैं मोहब्बत के लिए अपनी वीरानी नहीं चाहता।
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2 घंटे पहले

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