किसी के नक़्श-ए-क़दम पर चलना ज़रूरी तो नहीं,
हर एक राह का अपना सफ़र होना ज़रूरी तो नहीं।
जो आसमान छूना है तो पहले ख़ुद को पहचान,
हर उड़ने वाले को परिंदा होना ज़रूरी तो नहीं।
समंदरों से कह दो, तूफ़ान लेकर आएँ मगर,
हर नाव का किनारे पे ठहरना ज़रूरी तो नहीं।
जो गिर पड़ा है, उसे हार का नाम मत देना,
हर ठोकर का सफ़र से अंत होना ज़रूरी तो नहीं।
ज़माना अपने हिसाब से किरदार लिखता रहे,
हर आदमी का वैसा ही होना ज़रूरी तो नहीं।
चराग़ छोटा सही, रात से सवाल तो करता है,
हर रोशनी का सूरज होना ज़रूरी तो नहीं।
जो ख़ुद की तलाश में निकला, वही समझ पाया,
हर जवाब का किताबों में मिलना ज़रूरी तो नहीं।
‘अशफ़ाक़’ अपनी उड़ान का फ़ैसला ख़ुद करना,
हर आसमान का किसी और का होना ज़रूरी तो नहीं।
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