किसी के बिछड़ने का ग़म यूँ सँभाल रहा हूँ,
मैं टूटे हुए ख़्वाबों से ख़ुद को निकाल रहा हूँ।
मालूम है वो लौटकर शायद कभी न आए,
फिर भी उसकी राह में दिल को लगा रहा हूँ।
जो बात अधूरी रह गई थी हमारे दरमियाँ,
उसी ख़ामोशी को अब ग़ज़ल बना रहा हूँ।
वो लौटे तो इस बार कोई शिकवा न होगा,
मैं बीती हुई हर बात को पीछे छोड़ आऊँगा।
जिस मोहब्बत को वक़्त ने अधूरा छोड़ दिया,
उसे अपनी कलम से मुकम्मल बना रहा हूँ।
कभी उसकी याद आँखों में उतर आती है तो,
मैं मुस्कुराकर उसे दिल के पास बिठा रहा हूँ।
‘अशफ़ाक़’ जिसे खोकर भी भुला न सका दिल,
उसी शख़्स को हर रोज़ शायरी में पा रहा हूँ।
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