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नियति के हाथों

                
                                                         
                            आज निर्मम हताशा. सीना चीरकर खंजर-सी उतरने लगी है.
                                                                 
                            
छाती की हर धड़कन. वेदना बनकर बिखरने लगी है।

सीने में. उठती इस पीड़ा का क्या करूँ,
आँखों से बेबसी बनकर. बहते इस लहू का क्या करूँ?
सुलगते जिस्म में. उबलते दर्द का क्या करूँ?
अपने ही भीतर जलते. इस शोर का क्या करूँ?
आखिर क्यों.
प्रतिभा पूर्ण होने के बावजूद, कर्ण की भाँति नियति के हाथों.. हर बार मैं ही छला गया।
हुनर तो मुझमें भी एकलव्य-सा था, पर समर्थ गुरु के प्रपंच के आगे..हर बार, मै ही कुचला गया।

मैंने तो अपने हिस्से का आसमान. अपने ‘कौशल’ से चाहा था, मगर हर मोड़ नियति ने रास्ते में अँधेरा बो दिया।

हर बार असफलता के कड़वे घूँट पीता रहा, हर बार मुस्कुराने की कोशिश करता रहा, और हर बार अंदर से थोड़ा और टूटता रहा।
आज फिर मन में मरघट-सी ख़ामोशी छा गई… बहुत रोका इन आँखों को, मगर क्या करता—किस्मत पर अपनी रोना ही आ गया।।
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8 घंटे पहले

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