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अंजानी राहों पर

                
                                                         
                            अंजानी राहों पर अंजाने से
                                                                 
                            
चेहरे थे,
गौर से देखा तो कुछ पहचाने
से चेहरे थे।
थक चुके थे चलते चलते
तन्हा उन राहों पर,
आवाज़ दिया सुना ना कोई
शायद सब बहरे थे।
पलट कर किसी ने देखा वो
करीब भी आया,
हमें सुनाया जो लफ़्ज़ों के ज़ख़्म
गहरे थे।
भीग चलीं थी आंखें मगर छलक
ना सकीं,
हमारे चेहरे पे निग़ाहों के कुछ
पहरे थे।
कोई मिला ना ग़म ख़्वार राहें
कटती चलीं गयी,
दर्द दिल में दफ़न हुए जो सतह
पर ठहरे थे।
बड़ी मुश्किल से आयी नज़र
सूकुन-ए-मंज़िल हमें,
गये करीब तो पाया वहां
किस्मतों के पहरे थे।।
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36 मिनट पहले

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