कागज़ की कश्ती और प्यारा सा ज़माना,
ना कुछ खोने का डर था, ना कुछ पाने का ठिकाना था।
वो दोस्तों के साथ मिट्टी में खेलना,
वो हर छोटी सी बात पर मुस्कुरा देना।
काश लौट आएं वो बेफिक्र से दिन,
अधूरा है हर पल उस बचपन के बिन,
मगर रुको, आज फिर उन्हीं यादों को जगाते हैं,
चलो आज फिर सब पुराने दोस्तों को बुलाते हैं।
वही बचपना, वही हंसी फिर से ढूंढ लाएंगे,
अब बड़ी सी मुस्कान के साथ, नये हसीन पल बनाएंगे।
-आर्यन गुप्ता
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