कब सुनेंगे हम,
मां धरा की करुण पुकार,
कौन सा महल बनाना है,
जब धरा का धरा पर धरा रह जाना है।
गूंजती हुई पुकार ब्रह्मांड में,
झकझोर रही है, मनुज को,
रहने दो स्वच्छ वायु और जल को,
आने वाली पीढ़ियों को जीवन जीना है।
आखिर कब समझेंगे हम,
क्या बढ़ाते रहेंगे यूं ही अनदेखा कदम,
देते रहेंगे दर्द यूं ही मानवता को,
जब केवल कर्म ही संग संग जाना है।
भूल कर करुणा और निश्चल प्रेम की बाते,
क्यों बना रहे है भोर को अंधियारी राते,
यू दौड़ कर ये अंधी दौड़ को,
जब लक्ष्य केवल वसुधैव कुटुम्ब बनाना है।
चलो अब तो कर लो जागृति की बाते,
मिटाने चल दो अब तमस की राते,
कदम बढ़ा लो अब प्रकृति संग संग,
क्योंकि अब हर अंतःकरण में आनंद बसाना है।
-अरुणिमा बहादुर खरे 'वैदेही '
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