आप अपनी कविता सिर्फ अमर उजाला एप के माध्यम से ही भेज सकते हैं

बेहतर अनुभव के लिए एप का उपयोग करें

विज्ञापन

ग़ज़ल

                
                                                         
                            साथ हैं पर फ़ासले हैं दरमियाँ,
                                                                 
                            
चीख़ती दिल में दबी ख़ामोशियाँ।

रात चुप है दिल धड़कता है मगर,
चांद पर छाई हुई हैं बदलियाँ।

नींद मुझको क्यूं भला आती नहीं,
शोर करती दिल के अंदर सिसकियाँ।

उसकी ख़ुशबू है हवाओं में बसी,
तू खुली रख दिल की अपने खिड़कियाँ।

देखने को ख़ुश नज़र आता हूं मैं,
दिल के अंदर चल रही हैं आंधियाँ।

याद आती गांव की गलियां मुझे,
एक छोटा सा था अपना आशियां।

फल तुझे ये दें न दें बूढ़े शजर,
छाँव देंगी कुछ तो इनकी डालियाँ।

मुफ़लिसों की कर मदद तू शौक़ से,
अच्छी लगती हैं ख़ुदा को नेकियाँ ।
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
7 घंटे पहले

कमेंट

कमेंट X

😊अति सुंदर 😎बहुत खूब 👌अति उत्तम भाव 👍बहुत बढ़िया.. 🤩लाजवाब 🤩बेहतरीन 🙌क्या खूब कहा 😔बहुत मार्मिक 😀वाह! वाह! क्या बात है! 🤗शानदार 👌गजब 🙏छा गये आप 👏तालियां ✌शाबाश 😍जबरदस्त
विज्ञापन
X
बेहतर अनुभव के लिए
4.3
ब्राउज़र में ही

अब मिलेगी लेटेस्ट, ट्रेंडिंग और ब्रेकिंग न्यूज
आपके व्हाट्सएप पर