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ख़ूब महफ़िल सज रही थी मैं न था

                
                                                         
                            ख़ूब महफ़िल सज रही थी मैं न था,
                                                                 
                            
हो रही जब शायरी थी मैं न था ।

मेरी ग़ज़लें कह रहे थे लोग जो ,
दाद उनको मिल रही थी मैं न था।

खींच लाई जो तेरे दर पे मुझे,
वो मेरी ही बेख़ुदी थी मैं न था।

ढूंढती हैं वो निगाहें अब किसे ,
बात मेरी चल पड़ी थी मैं न था ।

हाल मेरा पूछने आई वो जब ,
मेरी मय्यत उठ चुकी थी मैं न था।

मयकदे तक खींच लाई जो मुझे,
वो मेरी ही तिश्नगी थी मैं न था।

तू मेरे दिल में ही रहती है सदा,
दिल में तेरे आजिज़ी थी मैं न था।
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एक घंटा पहले

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