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फिर कैसी आजादी?

                
                                                         
                            शोषण की चक्की चलती है, भ्रष्टाचार - मुनादी ।
                                                                 
                            
जन गण मन हो त्रस्त जहां पर,फिर कैसी आजादी?

कदम कदम पर यहां लुटेरे अपना जाल बिछाए
रक्त मांस की बात न पूछो हड्डी तक खा जाए
हाकिम ही जब बना लुटेरा जाए कहां फरियादी ?
जन गण मन हो त्रस्त जहां पर,फिर कैसीआजादी?

भय है,भ्रष्टाचार भूख है, पग पग पर लाचारी
कहीं झोपड़ी,कहीं भवन है - यहां विषमता भारी
दिन दिन बढ़ती जाती भूखे नंगों की आबादी ।
जन गण मन हो त्रस्त जहां पर,फिर कैसीआजादी?

समता का अधिकार कहां है,कोई हमें बता दे
कहां छिपी अपनी आजादी, खोज उसे फिर ला दे
जिनके हाथों में सत्ता है ,काट रहे हैं चांदी ।
जन गण मन हो त्रस्त जहां पर फिर कैसी आजादी?

निर्भय चित्त न मस्तक ऊंचा जन घुट घुट जीता है
कोई सुरापान करता, कोई आंसू पीता है
रोज रोज त्योहार मनाते,मिल कर खाकी खादी।
जन गण मन हो त्रस्त जहां पर,फिर कैसी आजादी?
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11 घंटे पहले

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