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मौका मिलेगा तो अपनी थकान लिखूँगा

                
                                                         
                            मौका मिलेगा तो अपनी थकान लिखूँगा,
                                                                 
                            
मैं अपनी ख़ामोशी के पीछे का तूफ़ान लिखूँगा।
जो गुज़री है मुझ पर, वो किसी ने देखी नहीं,
मैं अपनी आँखों में ठहरी हर रात लिखूँगा।

मेरे हिस्से में नींद कम, ज़िम्मेदारियाँ ज़्यादा हैं,
कुछ अधूरे सवाल हैं, कुछ मजबूत इरादे हैं।
एक तरफ़ घर की उम्मीदें मेरा रास्ता तकती हैं,
दूसरी तरफ़ मेरी उम्र है, जो मुझसे हिसाब माँगती है।

मैं वो छात्र हूँ जो थककर भी सो नहीं पाता,
कल की फ़िक्र में आज को भी जी नहीं पाता।
किताबों के पन्नों पर भविष्य तलाशता हूँ,
और खाली जेब में अपने सपनों का वज़न नापता हूँ।

कभी फ़ीस की चिंता, कभी किताबों का ख़र्च,
कभी ख़ुद से नाराज़गी, कभी हालात पर रोष।
दुनिया को लगता है कि मैं बस पढ़ रहा हूँ,
किसे ख़बर, मैं हर रोज़ ख़ुद से लड़ रहा हूँ।

मेरी मुस्कान को मेरी ख़ुशी मत समझ लेना,
मेरी ख़ामोशी को मेरी कमज़ोरी मत समझ लेना।
मैंने कई बार अपने आँसुओं को लौटाया है,
तब जाकर इन आँखों ने कोई सपना सजाया है।

कितनी रातें हैं, जो करवटों में गुज़र गईं,
कितनी इच्छाएँ हैं, जो ज़रूरतों में बिखर गईं।
कितनी बार मन ने कहा—अब और नहीं होता,
फिर घर का ख़याल आया, और मैं हारकर भी नहीं टूटा।

मुझे शिकायत नहीं कि रास्ते कठिन मिले,
दर्द इस बात का है कि अपने भी कम मिले।
हर कोई मेरी मंज़िल का पता पूछता रहा,
किसी ने यह नहीं पूछा कि मैं इस सफ़र में कैसा रहा।

मैं भी चाहता हूँ कि कभी बेफ़िक्र होकर सोऊँ,
बिना भविष्य की चिंता के कुछ पल अपने लिए जिऊँ।
मगर मेरे सपने मेरी नींद से बड़े हो गए,
हम उम्र से पहले ही ज़िम्मेदार हो गए।

मौका मिलेगा तो अपनी थकान लिखूँगा,
हर उस रात का पूरा बयान लिखूँगा।
जब किताब खुली थी, मगर आँखें नम थीं,
जब सपने पास थे, मगर परिस्थितियाँ कम थीं।

मैं लिखूँगा कि संघर्ष केवल ग़रीबी नहीं होता,
हर मुस्कुराता चेहरा भीतर से ख़ुश नहीं होता।
कुछ लोग उम्र नहीं, अपने हालात जीते हैं,
कुछ छात्र डिग्री से पहले ही ज़िंदगी सीखते हैं।

और जिस दिन मेरी मेहनत को मंज़िल मिलेगी,
मेरे घर की आँखों में सुकून की एक सुबह खिलेगी।
उस दिन मैं अपनी जीत का अभिमान नहीं लिखूँगा,
मैं उन दिनों को लिखूँगा, जब कोई मेरे साथ नहीं था।

क्योंकि मेरी सफलता सिर्फ़ मेरी नहीं होगी,
उसमें उन हाथों की मेहनत भी शामिल होगी,
जिन्होंने अपनी ज़रूरतें काटकर मुझे पढ़ाया है,
और हर मुश्किल में मेरे बेहतर कल का सपना सजाया है।

मौका मिलेगा तो अपनी थकान भी लिखूँगा,
अपने संघर्ष की पूरी पहचान लिखूँगा।
अभी तो ख़ामोशी से अपनी मंज़िल की ओर बढ़ रहा हूँ,
जिस दिन मुक़म्मल होऊँगा—
उस दिन अपनी नहीं, अपने जैसे हर संघर्षरत छात्र की कहानी लिखूँगा।
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47 minutes ago

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