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मैं लिखूँगा

                
                                                         
                            मैं एक मुसाफ़िर हूँ, तेरी मंज़िल का तलबगार नहीं,
                                                                 
                            
तेरे सफ़र का हिस्सा हूँ, पर तेरा हमसफ़र नहीं।
जो रास्ते जुड़ गए, वो भी इक इत्तेफ़ाक़ था,
पर रास्तों का मिलना, मोहब्बत का इज़हार नहीं।

दिल के शोर को रोका, ख़ामोशी के नाम पर,
छोड़े अपने ख़्वाब भी, तेरी मुस्कान के दाम पर।
फिर समझा — जो साथ वक़्त देता है सिर्फ़ एक मोड़ तक,
वो रिश्ता भी क़ैद है, आज़ादी के नाम पर।

अब मैं अपने रास्तों का नया फ़साना लिखूँगा,
ना इंतज़ार करूँगा, ना तेरा अफ़साना लिखूँगा।
मुसाफ़िर हूँ, और रास्ते मेरी क़िस्मत बन गए,
तुझे याद करूँ भी तो बस इक गुज़रा ज़माना लिखूँगा।
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एक वर्ष पहले

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