विचारों से सदैव प्रेरणा लेना,
आत्म चिंतन, मौन मनन, चितेरे बन,
शोध कर लेना।
किंतु सदैव, सजग सतत्, स्मरण रखना।
जो स्वयं 'ब्रह्म' स्वरूप हैं उन शब्दों को, कभी ना चुराना।
ना ख़रीदना, ना बेचना, और ना बिकना।
क्योकि
"शब्द"
हृदय हैं, प्राण हैं, आत्मा हैं,
सहज अभिव्यक्ति का
सरल माध्यम हैं,
इस नश्वर जगत में,
अस्तित्व का तुम्हारे,
बस सिर्फ़ यही, "शब्द"
ही तो साक्षात, 'प्रमाण' हैं।
~अर्द्धचंद्रधारी त्रिपाठी
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