जो कही नहीं उसे भी
कैसे सुन लेते हो तुम,
निगाहों की जुबां,
लरजते लबों की थरथराहट,
धड़कनों की हर थाप,
आंखों में सिमटी बूंदें,
फड़कती बाहों की जुबां,
इतना आसान तो नहीं,
समझ पाना बेजुबानों की जुबां,
कदमों की हर थाप पर दुम हिलाते,
तूफानों से पहले छोड़ कर घोंसले,
कैसे उड़ जाते हो तुम,
बादलों के घिरते ही आसमां में,
बिजली कड़कने से पहले,
कैसे समझ जाते हो तुम,
कुदरत की हर जुबां,
दुनियां की हर महामारी,
बड़ी आपदाएं बीमारी,
क्यों है सिर्फ इंसानों पर भारी,
बेजुबानों को कैसे पता है,
प्रकृति का हर संदेश जानता है,
बस वही जो प्रकृति की गोद में है,
प्रकृति बचाती है बस सिर्फ उसे,
जो सदा प्रकृति की गोद में है।
बड़ा दंभ है इंसानों तुम्हें,
अपने अविष्कारों का,
विज्ञान के बड़े जानकार बनकर,
बड़ी उन्नत तकनीक बना ली है,
इंसानों तुमने प्रकृति से छल करके,
अलग अपनी दुनियां बसा ली है,
पर प्रकृति नहीं छोड़ती किसी को,
बचता है वही बस यहां पर,
जो सदा प्रकृति की गोद में है।
~अर्द्धचंद्रधारी त्रिपाठी
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