जो मेरी मंजिल न थी,
उसी को पाना चाहते थे।
ख्वाहिशें दिल की अधूरी,
हम मिटाना चाहते थे।
और जब ऐसा सबक,
हमें दिया उस बेवफा ने।
एहसास था इस बात का,
ए मेरी राह-ए-मंजिल न थी।
दिल ना माने जाने क्यूं,
खूद ही हम डूब गए थे।
समंदर की गहराई का,
एहसास ही नहीं हुआ था।
तन्हाइयों में बेबसी ने हमें,
सोचने का वक्त ना दिया था।
बात दिल के दर्द की थी बस,
समझने का मौका ना दिया था।
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