छोटे से आँगन में खेलती एक बच्ची,
जिसकी हँसी गूँजती पूरे घर में।
अपने नन्हे से हाथों से,
वो गुड़िया के बाल सँवारती,
ना आने वाले कल की कोई चिंता उसे सताती,
बस अपनी छोटी-सी दुनिया में ही वो समाती।
माँ और पापा की वो थी दुलारी,
और अगर कभी रो दे,
तो घर सिर पर उठा लेती।
थोड़ी-सी नटखट, हर बात पर हँसने वाली,
वो अपनी ही दुनिया में खुश रहने वाली।
फिर एक दिन वो बड़ी होने लगी,
दुनिया को धीरे-धीरे समझने लगी।
जिसके दिल में कभी सिर्फ खुशियाँ ही झलकती थीं,
अब वो थोड़ी-सी खाली रहने लगी।
वो गुड़िया, जो कभी उसकी सहेली हुआ करती थी,
अब थोड़ी-सी अकेली रहने लगी है।
जिसे बारिश से कभी लगाव था,
अब वो उसे देखकर डरने लगी है।
जो कभी माँ और पापा की दुलारी हुआ करती थी,
अब कहते हैं, वो हाथ से निकलने लगी है।
जो थोड़ी-सी नटखट, हर बात पर हँसा करती थी,
अब सबको झूठी मुस्कान दिखाने लगी है।
जिसकी हँसी पूरे घर में गूँजा करती थी,
अब वही खामोशी अंदर ही अंदर उसे खाने लगी है।
हँसती तो वो अब भी है,
लेकिन उसके अंदर की बच्ची
थोड़ी-सी नाराज़ हो गई है।
वो बाहर निकलना चाहती है,
लेकिन हिम्मत नहीं कर पाती है।
आँगन में दिन भर खेलने वाली,
अब अपने कमरे से बाहर नहीं निकलती है।
अब वो बड़ी हो गई है,
अब वो अपने आप को कहीं खो चुकी है।
एक बार निकलने दो उस बच्ची को,
फिर से चहक उठेगा वो आँगन।
फिर से वो अपनी गुड़िया के बाल सँवारेगी,
फिर से उसकी हँसी पूरे घर में गूँजेगी।
बड़ी तो वो शरीर से हो जाएगी,
लेकिन दिल से हमेशा बच्ची ही रहेगी।
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