औरत कितनी भी पढ़-लिख जाए, पुरुषों से आगे बढ़ जाए।
शेरनी सी दहाड़े चाहे वह, या करोड़ों की मालकिन बन जाए।
पर यह दुनिया आज भी उसे, बस उसके रूप से ही तौलती है,
उसकी काबिलियत को छोड़, बस उसकी सूरत टटोलती है।
बढ़ती उम्र पर ताना कसने वालों, ज़रा खुद का चेहरा भी आईने में देख लो,
उसके कड़े संघर्ष और कामयाबी को पहचानो, फिर अपनी हैसियत का पैमाना नाप लो।
कितनी छोटी है वह सोच, जो केवल इस देह को ही परखती है,
दुनिया जिसके हौसले और चुनौतियों को छोड़, बस जिस्म की उम्र देखती है।
उसकी सब अच्छाइयाँ और कामयाबी एक तरफ भूल, बात उसके शरीर पर आकर रुकती है।
माँ बनी है वह, तो रूप बदला, यह तो प्रकृति का स्वाभाविक विधान है,
जिस हुस्न की कल तक तारीफ थी, आज उम्र ढलने पर वही क्यों बनता आफ़त का सामान है?
वह मोटी, भद्दी या बदसूरत नहीं, सबसे पहले एक सफल इंसान है,
सशक्त, स्वाभिमानी और आत्मनिर्भर, वह नारी शक्ति की पहचान है।
विदेशी ज़मीन से आकर जिसने, अपनी मेहनत से इतिहास लिखा,
भाषा की दीवारें तोड़, जिसने सफलता का हर अंदाज़ सीखा।
आज वह इस इंडस्ट्री की शान है, करोड़ों दिलों की धड़कन है,
पर अफ़सोस! इस दुनिया की सोच, आज भी रूप-रंग की बंधक है।
सोशल मीडिया पर बैठ जो उसे 'बुड्ढी' कह अपनी सोच दिखाते हैं,
वे आईने में खुद का अक्स देखना, शायद भूल जाते हैं।
बस करो अब! आखिर कब तक इस रूप के तराजू पर तौलोगे?
ऐश्वर्या, बिपाशा, कैटरीना... आखिर कब तक?
अगला नम्बर हम में से भी किसी एक का होगा
फिर ट्रोलर्स का एक भयानक चेहरा और नफरत दिखेगा।
-अनुराधा कामेंद्र साहनी
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