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शहर सो गया।

                
                                                         
                            शहर सो गया है मगर, चाँदनी मेरी खिड़की पर आकर बैठ गई है,खामोश है ज़माना सारा, पर मेरे कमरे में एक महफ़िल सी सज गई है।
                                                                 
                            
बगल में चलता पंखा जैसे कोई धीमा सा राग सुना रहा है,मेरी कोरी डायरी का पन्ना, मुझसे ही कुछ शब्द मांग रहा है।
एकांत कमरा, सूनी कुर्सी और ख्वाबों का एक अनकहा ताना-बाना है,खिड़की के पार अंधेरे में, छुपा हुआ कोई अदृश्य सा ज़माना है।
हवा का वो सर्द झोंका, ज़ुल्फ़ों को सहलाकर एक नया पैगाम दे गया,थाम कर मेरे हाथों को, वो मुझे इसी हसीन पल में जीना सिखा गया।
सामने खड़ी सफेद दीवार, अब अतीत की कोई दास्तान सुना रही है,भूलकर सारे शिकवे-गिले, मुझे खुद से मिलने का रास्ता दिखा रही है।
थका चुका है मन को यह शोर, अब मैं खामोशी को चुनना चाहती हूँ,बंद करके दुनिया के सारे दरवाज़े, आज मैं अपने अंतर्मन को सुनना चाहती हूँ।
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
17 घंटे पहले

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