मुझे किसी भी घर के अंदर जाना अच्छा नहीं लगता,
फिर वो अपना हो या किसी अजनबी का।
मुझे घर से ज़्यादा
उसका दरवाज़ा दिलचस्प लगता है,
जो घर में घुसने का
एक ही रास्ता होता है।
वो खुला दरवाज़ा—
जिसके बाहर खड़े होकर
मैं अपनी कल्पना का घर बना सकती हूँ।
अपने रंगों का,
अपने हिसाब का,
जिसमें थोड़ा बंद हो,
बाकी सब खुला हो।
दरवाज़े के ऊपर से जाती हुई
रंग-बिरंगी बेल,
काले दरवाज़े के बीच
सुनहरे रंग की एक लकीर,
और दोनों ओर टंगी
दो सुनहरी रोशनियाँ।
खुला आँगन,
जो हर किसी का स्वागत करता है,
बगल में खुला बगीचा,
जो हर कहानी को
अपनी खुशबू से गढ़ता है।
एक झूला,
जो ज़िंदगी की ऊँची छलाँग लगाता है,
फिर लौटकर
ज़मीन पर ही रुक जाता है।
बाहर की सफ़ेद दीवारें,
जो नया आईना देती हैं
कुछ नया लिखने को।
सूरज की हल्की रोशनी,
जो घर के अंदर तक चली जाती है।
खिड़कियों से आती मद्धम हवा,
जो मन को धीरे से
सहला जाती है।
इंद्रधनुष के रंगों की परछाई,
हर अपने-से त्योहार का
पता बताती है।
ज़मीन पर कुछ जगह
इंसानी रिश्तों के निशान हैं,
जो अपनी उम्र बताते हैं।
दो-तीन खाली कुर्सियाँ
अकेलेपन का पता देती हैं,
और बाहर कहीं से आती
हँसी-ठिठोली की आवाज़
उस अकेलेपन को
थोड़ा-सा काट जाती है।
शायद इसीलिए
मुझे घर से ज़्यादा
उसका दरवाज़ा पसंद है—
क्योंकि उसके बाहर खड़े होकर
मैं हर बार
अपना एक नया घर
बना लेती हूँ।
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