अगर कोई मुझसे पूछे,
मैं जीवन में क्या चाहती हूँ—
आज मन किया कि
दीवान पर पड़ी पीली चादर को
नीली से बदल दूँ।
उसके साथ
वो हरे-गुलाबी तकिए के कवर
निकाल दूँ।
दो दिन से
गुलदस्ते में फूल खराब हो रहे हैं,
बाज़ार जाकर
नए ले आऊँ।
घर की दीवारों को
अपने पसंदीदा नीले रंग से
सजा दूँ।
वो जो किताबों की अलमारी है,
उसमें जो किताबें
अभी तक छुई नहीं गईं,
उन्हें भी खोलकर
कभी धूप लगाऊँ।
खाने में मुझे अरबी पसंद नहीं,
मम्मी से बोलकर
आलू के पराठे बनवाऊँगी।
मम्मी की हमेशा शिकायत रहती है—
वो जो कपड़े
घूर की तरह अलमारी में
पड़े रहते हैं।
उनका नंबर ही बहुत कम आता है,
उन्हें लगता है
मेरी कोई लड़ाई तो नहीं।
पिछली बार वो पीला सूट
शायद एक साल पहले पहना था।
सजने-सँवरने का शौक है मुझे,
पर आता नहीं—
वो अलग बात है।
रोटी आज भी
मुझसे गोल नहीं बनती,
पर खाना ठीक-ठाक
बना लेती हूँ।
आज बाज़ार से
नई जूती लाई थी,
हील से डर लगता है।
आज घर में
सामानों की थोड़ी अदला-बदली भी की,
मन बहुत प्रफुल्लित हुआ।
आज शाम
काफ़ी देर उसी झूले पर बैठी,
खुद के लिए चाय बनाई
और खुद के साथ
थोड़ा समय बिताया।
आज वो पड़ोसी का बच्चा
फिर से दरवाज़े पर खड़ा था।
पता नहीं,
उसको अपना हमउम्र
यहाँ कौन मिलता है।
तभी फोन पर
किसी की बातें सुनीं,
मेरे बारे में
गुफ़्तगू हो रही थी।
घर में
थोड़ी और जगह बनाने की
बात हो रही थी।
जगह मतलब—
उन्हीं जगहों को
थोड़ा और सिकोड़ना।
ये गलत बात है।
पापा अभी-अभी
बाहर से आए हैं,
उनकी आहट से
पता चल गया हमें।
वो फिर से
बाज़ार से अरबी
ले आए हैं।
आज शाम का
युद्ध पक्का है।
तभी आवाज़ आती है—
“बैग बाद में देख लेना,
पहले पानी तो दे दो।”
पानी, चाय
और फिर एक नई चर्चा—
युद्ध की बात तो
जैसे हवा हो गई।
अब धीरे-धीरे
घर के पर्दे,
खिड़कियाँ बंद हो रहे हैं।
मैं फिर से
उसी नीली चादर पर
आ पहुँचती हूँ।
थोड़ा ठहरती हूँ,
और फिर
मीठी नींद की आग़ोश में
खो जाती हूँ।
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