जंतर-मंतर गूँज रहा है, ऊँचे-ऊँचे नारों से,
देश नहीं चलता साथी, केवल जय-जयकारों से।
पेपर लीक के बहाने कोई राम को गाली देता है
संवाद छोड़कर केवल, आरोपों का शोर मचाता है।
ढ़पली बजाते नारो के बीच, शोर बना सम्मान
तर्क, विवेक और सत्य का, हो रहा अपमान।
भीड़ जुटाकर शोर मचाने का, कब तक होगा काम?
संवादों से हल निकलेंगे, यही समय का पैगाम।
युवा शक्ति को नहीं चाहिए,बनना किसी की ढाल,
सच की राह पर साथ चलो, छोड़ो झूठा जाल।
जो परीक्षा का मान गिराएँ, उन पर हो प्रहार,
ईमानदारी के दुश्मन से , हो कठोर व्यवहार।
न शिक्षा फिर से थमे, न भविष्य हो लाचार,
हर अभ्यर्थी को न्याय मिले, यही हो अधिकार।
क्रोध अगर संसद बन बैठे, कैसा होगा देश?
हर गलियारे गूँज उठेगा, केवल द्वेष ही द्वेष।
आओ मिलकर राह चुनें, जिसमें हो विश्वास,
संवाद, सुधार और न्याय से, रचे नया इतिहास।
-अनुपम शुक्ल
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