क़सम-ओ-क़ौल उठाती हो
क्यों तुम अब घबराती हो
कितने सारे वादे करके
अच्छा, अब तुम जाती हो
लगा कर रुख़सार पे लाली
हमको क्यों तड़पाती हो
तेरे आँगन से रिश्ता है मेरा
मेरे आँगन में क्यों नहीं आती हो
कुछ फूल-बूटे हैं गुलशन में
मुझको छोड़ किसी की ग़ज़लें गाती हो
'सुब्रत' से तेरा रिश्ता क्या है
'सुब्रत' को क्यों तुम भाती हो...
~ अनुज सुब्रत
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